Saturday, June 07, 2008
दुम हिलाने का पॉंच-साला रिकॉर्ड
पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने से मुद्रास्फीति अब वैसे भी राजधानी एक्सप्रेस की तरह दौड़ने वाली है।
पर मुझ जैसे नासमझ बालक कहेंगे कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आटे-दाल का भाव बढ़ने से हमें क्या। हम भले पेट्रोल का उत्पादन नहीं करते पर अन्न का तो करते हैं। पर भैये हम उत्पादित अन्न ही खाते रहेंगे तो हमारी सरकार के उन चहेते ठेकेदारों, मंत्रियों का क्या होगा जो विदेशों से आयातित अन्न में घपले पर ही पल रहे हैं। उन बेचारों के तो फाके हो जाएंगे और बड़ी-बड़ी कंपनियॉं हमारा ही गेंहूं खरीदकर हमें पिज्जा-बर्गर एटसेट्रा एटसेट्रा खिलाकर अपनी जेबें कैसे भरेंगी। जब इतनी महंगाई में गेहूं का आयात ही करना पड़ रहा है तो भी किसानों को समर्थन मूल्य पिछले साल की तुलना में क्यों नहीं बढ़ा है और बाकी पैसा किसकी जेब में जा रहा है।
कालाबाजारी रोकने और दूसरी हरित क्रांति की बातें ये ऐसे करते हैं जैसे मोंटेकजी लैपटाप पर बटन दबायेंगे और उधर सब हो जायेगा। हरित क्रांति तो नहीं इनके कृषि मंत्री ने देश में क्रिकेट क्रांति जरूर कर दी है। अब जब भी महंगाई बढ़ेगी और जनता चिल्लायेगी ये कहेंगे येल्लो देखो आपके लिए एक नया तमाशा- एक और आईपीएल।
मनमोहनजी अब जिस पैट्रोल का रोना रो रहे हैं उनके ये आंसू तब कहां थे जब छाती तान के कहे फिरते थे कि हम परमाणु करार करेंगे, हम ऊर्जा जरूरतों का हल निकालेंगे। पांच सालों मे इनकी यही उपलब्धि रही कि ना तो ये परमाणु करार ही कर पाए ना ही ईरान से गैस ही ला पाए। हां देश को ऊर्जा संकट की गहरी खाई में खूब जोर का धक्का मार के गिरा दिया और मजे से गद्दार वामपंथियों के साथ सत्ता-सुख लूट रहे हैं। कहां तो परमाणु करार ना होने पर कहते थे कि गिरा दो सरकार वहीं अब वामपंथियों की मुहब्बत में पागल होकर आंखें मूंदे बैठे हैं।
उपलब्धियां इनकी बड़ी काबिलेगौर रहीं। सच्चर-सच्चर, कोटा-कोटा अलापते हुए इनको लगा कि जनता को कुछ नहीं चाहिए। अल्पसंख्यक कार्ड और अलां-फलां कार्ड से ही उसका पेट भर जाना है। सो पांचों साल ये सच्चर-सच्चर, कोटा-कोटा जैसे राग अलापते रहे। जबकि प्राथमिक स्तर पर सर्व-शिक्षा अभियान कैसा तमाशा बना हुआ है ये इन्हें नजर नहीं आया। सबको बिना स्कूल भेजे ही उच्च शिक्षित बना देने की जादू की छड़ी जो इन्हें मिल गई है।
कांग्रेस पार्टी की मालकिन(अध्यक्ष कहना भद्दा लगता है यहां) सोनिया मैडम, जो कि हिंदुस्तान के अब तक के इतिहास मे त्याग की एकमात्र प्रतिमूर्ति हैं, ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के नाम पर अपने भक्तों को खूब रेवडि़यां बांटीं कि ले जाओ बेटा कमाओ और ऐश करो। जिन लोगों को इस बात पर शक है वे खुद इसकी पड़ताल करें और देखें कैसे मैडम के भक्त हर जिले, ब्लॉक मे इस योजना के प्रभारी बने हुए हैं जबकि ना ही वे जनप्रतिनिधि हैं और ना ही इसे क्रियान्वित करने के लिए सरकारी अमले की कोई कमी है। अहा क्या बल्ले-बल्ले हो रही है जी सोनिया मैडम के चेलों की। जिस पैसे को मनमोहनजी ग्रामीणों तक पहुंचाने का दम भरते हैं वही पैसा कांग्रेसी दलालों की दलाली के पैसे से खरीदी कारों से धुंए के रूप में उड़ता दिखाई देगा। पेट्रोल की कीमतें उनके लिए थोड़े ना बढ़ी हैं जी।
और मनमोहनजी को बधाई जल्द ही वे मैडम के सामने दुम हिलाने का पांच-साला रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं।
(ये लेख बहुत जल्दी में लिखा गया है। वैसे भी मुझ जैसे बालकों को लाग-लपेटवाले अंदाज में बात करना पसंद नहीं है। मेरे ख्याल में इतनी स्पष्टवादिता पर शायद लोग नाक-भौं सिकोडें। यदि गलत हूं तो मार्गदर्शन करें। ब्लॉग जगत में लोग जहां व्यक्तिगत रूप से तो खूब कीचड़ उछालने का खेल खेलते हैं पर राष्ट्रीय मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखने में रुचि कम लेते हैं। मेरी गुजारिश है कि जब देश-दुनिया में इतना कुछ हो रहा है तो खुलकर विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय रखना और उन पर बहस करना ब्लॉग जगत के लिए बेहतर है बजाय व्यक्तिगत आक्षेप लगाने या कीचड़ उछालने के)
कोई तो सुने इन दहेज कानून पीडि़तों की
ऐसी ही कई कहानियॉं आपको मिल जाएंगी जिनमे पत्नी-पीडि़त पति के पास सिवाय घुट-घुटकर जीने के कोई विकल्प ही नहीं बचता। क्योंकि हमारे भारतीय कानूनों के अनुसार पीडि़त केवल पत्नी ही हो सकती है पति(या उसके परिजन) नहीं। हालांकि ये कानून बनाये तो गये थे समाज मे स्त्रियों के शोषण को रोकने और शोषितों को सजा दिलवाने के लिए और इनका उपयोग आरोपियों को सजा दिलाने में हो भी रहा है। पर उन निर्दोष पतियों और उनके परिजनों का क्या जो बिना मतलब घुन की तरह पिस रहे हैं क्योंकि कानून मे उनके लिए कोई उपचार है ही नहीं ?
हालांकि ऐसे बेचारे पत्नी-पीडि़तों के किस्से तो बहुत हैं । पर मुद्दे की बात पर आते हैं। कुछ दिन पहले राजेश रोशनजी के ब्लॉग पर एक चित्र छपा था-

इसे पढ़कर लगा कि क्या वाकई दहेज संबंधी कानूनों ने कुछ पतियों का जीना मुहाल कर रखा है ?
हालांकि आस-पास के क्षेत्र में ऐसी एक-दो घटनाओं के बारे में सुना तो था पर नेट पर खोजा तो इस साइट पर काफी सारे मामले ऐसे देखने को मिले। भारतीय महिला से शादी करने से पहले सोचने की चेतावनी के साथ धारा 498a एवं घरेलू हिंसा अधिनियम के बारे में काफी सारी बातें कही गई हैं। और तो और कई शहरों में उपलब्ध टेलीफोन हेल्पलाइन के साथ-साथ यहां ऑनलाइन सलाह भी दी जा रही है। पर बेचारे पति करें भी तो क्या ?
आप सभी की प्रतिक्रियाओं के इंतजार में-
Saturday, April 05, 2008
ग से ‘गाय’ नहीं सी फॉर ‘काऊ’
मेरे चिट्ठे पर प्रकाशित डा. निरंजन कुमार का आलेख पढ़कर हमें पता चला कि कैसे इस देश का नाम इंडिया पड़ा और अपने देश के लिए आजकल भारत या हिन्दुस्तान की बजाय लोग विदेशियों की तर्ज पर इंडिया शब्द का प्रयोग करना अपनी शान समझते हैं।
पर ये इंडियंस वास्तव में चाहते क्या हैं ? इंडिया शब्द कहने से केवल इस बात का बोध नहीं होता कि फलां व्यक्ति अपने देश का नाम अंग्रेजी में ले रहा है बल्कि इसके बहुत गहरे निहितार्थ हैं और इसके पीछे की मंशा पर भी विचार किया जाना चाहिए।
एक देश दो नाम
एक देश दो नाम
साभार: दैनिक जागरण
Friday, April 04, 2008
चीन के आगे गिड़गिड़ाने के मायने
अब तो रोजमर्रा की बात हो चली है कि हमारे माननीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी चीन को आश्वासन देते रहते हैं कि हमारी धरती से आपके खिलाफ हम कोई गतिविधि नहीं होने देंगे। उधर चीन कभी आंखें दिखाता है तो कभी पीठ थपथपाता है।
फिर से प्रणब मुखर्जी ने चीन के आगे घुटने टेकने वाले रुख के साथ वही बात दोहराई कि भारत तिब्बत को चीन का हिस्सा मानता है और भारत में ओलंपिक मशाल को पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी। साथ ही दलाईलामा को फिर से समझाया गया है कि वे भारत में बस मेहमान बनकर रहें और चीन के खिलाफ कोई हरकत न करें। हालांकि वैसे भी वे कुछ करने के मूड में नहीं लगते।
विदेश नीति के हिसाब से देखा जाए तो भारत और चीन के रिश्तों में लंबे समय की कटुता के बाद अब संबंध सामान्य हो चले हैं। हालांकि जानकारों का कहना है कि द्विपक्षीय संबंधों के इस मधुर दौर में भारत को चीन के खिलाफ कुछ भी कहने से बचना चाहिए। पर मेरा मानना है कि भारत भले ऐसा सोचता हो चीन कभी भारत के साथ संबंध मधुर रखने का पक्षधर नहीं रहा है। वह केवल दबाव की विदेश नीति भारत जैसे देशों पर लागू करता रहा है और संभवत: आगे भी करता रहेगा। दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध भी इस कारण सामान्य हैं कि भारत के साथ उसका कारोबार 60 अरब डॉलर के आंकड़े पर दस्तक दे रहा है और आर्थिक संबंधों को बनाये रखने तथा भारत में अपना माल खपाने के लिए वह अच्छे संबंधों की बात कर रहा है। यदि भारत-चीन कारोबार ऐसी ऊंचाईयां नहीं छू रहा होता तब भी क्या वह भारत के साथ ऐसे ही संबंधों का पक्षधर होता इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है। संबंधों की इस कथित मधुरता के दौर में भी वह भारत के प्रधानमंत्री के अपने ही एक सीमांत प्रदेश में दौरे पर आपत्ति उठाता है और प्रणब मुखर्जी जैसे लोगों को उसका बचाव करना पड़ता है।
कूटनीतिक नजरिए से देखा जाए तो भारत ने तिब्बत मसले पर प्रारंभ में समझदारी का परिचय दिया और तिब्बत को चीन का घरेलू मामला मानकर उससे दूरी बनाये रखी। यहां तक कि पूरा विश्व समुदाय इस बात पर चीन को गरियाता रहा पर भारत यही दोहराता रहा कि तिब्बत चीन का अभिन्न अंग है और वह अपनी जमीन से चीन विरोधी कोई गतिविधि नहीं होने देगा। वैसे भी भारत को चीन से सुधरते संबंधों की कीमत पर तिब्बत मसले में कोई टांग नहीं अड़ानी चाहिए। खासकर तब जब तिब्बती धर्मगुरू और उनकी निर्वासित सरकार भारतीय क्षेत्र में रहती है। क्योंकि इससे सीधा-सीधा संदेश जाता कि भारत अपनी जमीन से चीन विरोधी त्त्वों को समर्थन दे रहा है।