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Saturday, June 07, 2008

दुम हिलाने का पॉंच-साला रिकॉर्ड

मुझे मनमोहन सिंहजी से पूरी उम्‍मीद है कि वे जल्‍द ही टीवी पर आकर राष्‍ट्र के नाम अपने संबोधन में कहेंगे कि हम मजबूर हैं, अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में आटे-दाल की कीमतें बढ़ रही हैं जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं है इसलिए हम कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं। आप महंगे आटा-दाल को थोड़े धैर्य के साथ मिलाकर खाएं या थोड़ा कम खाना खाएं। फिर वे अपने मंत्रियों से कहेंगे कि अपने कुत्‍तों को एसी की हवा खिलाने की बजाय थोड़ा बाहर ठंडी हवा में घुमाएं और सरकारी खर्चे के बचत अभियान में सहयोग करें।
पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने से मुद्रास्‍फीति अब वैसे भी राजधानी एक्‍सप्रेस की तरह दौड़ने वाली है।

पर मुझ जैसे नासमझ बालक कहेंगे कि अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में आटे-दाल का भाव बढ़ने से हमें क्‍या। हम भले पेट्रोल का उत्‍पादन नहीं करते पर अन्‍न का तो करते हैं। पर भैये हम उत्‍पादित अन्‍न ही खाते रहेंगे तो हमारी सरकार के उन चहेते ठेकेदारों, मंत्रियों का क्‍या होगा जो विदेशों से आयातित अन्‍न में घपले पर ही पल रहे हैं। उन बेचारों के तो फाके हो जाएंगे और बड़ी-बड़ी कंपनियॉं हमारा ही गेंहूं खरीदकर हमें पिज्‍जा-बर्गर एटसेट्रा एटसेट्रा खिलाकर अपनी जेबें कैसे भरेंगी। जब इतनी महंगाई में गेहूं का आयात ही करना पड़ रहा है तो भी किसानों को समर्थन मूल्‍य पिछले साल की तुलना में क्‍यों नहीं बढ़ा है और बाकी पैसा किसकी जेब में जा रहा है।
कालाबाजारी रोकने और दूसरी हरित क्रांति की बातें ये ऐसे करते हैं जैसे मोंटेकजी लैपटाप पर बटन दबायेंगे और उधर सब हो जायेगा। हरित क्रांति तो नहीं इनके कृषि मंत्री ने देश में क्रिकेट क्रांति जरूर कर दी है। अब जब भी महंगाई बढ़ेगी और जनता चिल्‍लायेगी ये कहेंगे येल्‍लो देखो आपके लिए एक नया तमाशा- एक और आईपीएल।

मनमोहनजी अब जिस पैट्रोल का रोना रो रहे हैं उनके ये आंसू तब कहां थे जब छाती तान के कहे फिरते थे कि हम परमाणु करार करेंगे, हम ऊर्जा जरूरतों का हल निकालेंगे। पांच सालों मे इनकी यही उपलब्धि रही कि ना तो ये परमाणु करार ही कर पाए ना ही ईरान से गैस ही ला पाए। हां देश को ऊर्जा संकट की गहरी खाई में खूब जोर का धक्‍का मार के गिरा दिया और मजे से गद्दार वामपंथियों के साथ सत्‍ता-सुख लूट रहे हैं। कहां तो परमाणु करार ना होने पर कहते थे कि गिरा दो सरकार वहीं अब वामपंथियों की मुहब्‍बत में पागल होकर आंखें मूंदे बैठे हैं।

उपलब्धियां इनकी बड़ी काबिलेगौर रहीं। सच्‍चर-सच्‍चर, कोटा-कोटा अलापते हुए इनको लगा कि जनता को कुछ नहीं चाहिए। अल्‍पसंख्‍यक कार्ड और अलां-फलां कार्ड से ही उसका पेट भर जाना है। सो पांचों साल ये सच्‍चर-सच्‍चर, कोटा-कोटा जैसे राग अलापते रहे। जबकि प्राथमिक स्‍तर पर सर्व-शिक्षा अभियान कैसा तमाशा बना हुआ है ये इन्‍हें नजर नहीं आया। सबको बिना स्‍कूल भेजे ही उच्‍च शिक्षित बना देने की जादू की छड़ी जो इन्‍हें मिल गई है।

कांग्रेस पार्टी की मालकिन(अध्‍यक्ष कहना भद्दा लगता है यहां) सोनिया मैडम, जो कि हिंदुस्‍तान के अब तक के इतिहास मे त्‍याग की एकमात्र प्रतिमूर्ति हैं, ने राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के नाम पर अपने भक्‍तों को खूब रेवडि़यां बांटीं कि ले जाओ बेटा कमाओ और ऐश करो। जिन लोगों को इस बात पर शक है वे खुद इसकी पड़ताल करें और देखें कैसे मैडम के भक्‍त हर जिले, ब्‍लॉक मे इस योजना के प्रभारी बने हुए हैं जबकि ना ही वे जनप्रतिनिधि हैं और ना ही इसे क्रियान्वित करने के लिए सरकारी अमले की कोई कमी है। अहा क्‍या बल्‍ले-बल्‍ले हो रही है जी सोनिया मैडम के चेलों की। जिस पैसे को मनमोहनजी ग्रामीणों तक पहुंचाने का दम भरते हैं वही पैसा कांग्रेसी दलालों की दलाली के पैसे से खरीदी कारों से धुंए के रूप में उड़ता दिखाई देगा। पेट्रोल की कीमतें उनके लिए थोड़े ना बढ़ी हैं जी।

और मनमोहनजी को बधाई जल्‍द ही वे मैडम के सामने दुम हिलाने का पांच-साला रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं।


(ये लेख बहुत जल्‍दी में लिखा गया है। वैसे भी मुझ जैसे बालकों को लाग-लपेटवाले अंदाज में बात करना पसंद नहीं है। मेरे ख्‍याल में इतनी स्‍पष्‍टवादिता पर शायद लोग नाक-भौं सिकोडें। यदि गलत हूं तो मार्गदर्शन करें। ब्‍‍लॉग जगत में लोग जहां व्‍यक्तिगत रूप से तो खूब कीचड़ उछालने का खेल खेलते हैं पर राष्‍ट्रीय मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखने में रुचि कम लेते हैं। मेरी गुजारिश है कि जब देश-दुनिया में इतना कुछ हो रहा है तो खुलकर विभिन्‍न मुद्दों पर अपनी राय रखना और उन पर बहस करना ब्‍लॉग जगत के लिए बेहतर है बजाय व्‍यक्तिगत आक्षेप लगाने या कीचड़ उछालने के)

कोई तो सुने इन दहेज कानून पीडि़तों की

ये शिकायत है अहमदाबाद के योगेश कुमार जैन की, जिनका 43 वर्षीय बड़ा भाई, जो कि पेशे से डॉक्‍टर है, विगत 16-17 वर्षों से मानसिक बीमारी से जूझ रहा है। उसकी पत्‍नी इन्‍हें ब्‍लैकमेल कर रही है कि अपनी मां के नाम पर जो मकान है, जिसकी कीमत तकरीबन 50 लाख रुपये है, उसे उसके नाम कर दिया जाए नहीं तो वह भारतीय दंड संहिता की धारा 498a के तहत उनकी शिकायत दर्ज कराएगी।

ऐसी ही कई कहानियॉं आपको मिल जाएंगी जिनमे पत्‍नी-पीडि़त पति के पास सिवाय घुट-घुटकर जीने के कोई विकल्‍प ही नहीं बचता। क्‍योंकि हमारे भारतीय कानूनों के अनुसार पीडि़त केवल पत्‍नी ही हो सकती है पति(या उसके परिजन) नहीं। हालांकि ये कानून बनाये तो गये थे समाज मे स्त्रियों के शोषण को रोकने और शोषि‍तों को सजा दिलवाने के लिए और इनका उपयोग आरोपियों को सजा दिलाने में हो भी रहा है। पर उन निर्दोष पतियों और उनके परिजनों का क्‍या जो बिना मतलब घुन की तरह पिस रहे हैं क्‍योंकि कानून मे उनके लिए कोई उपचार है ही नहीं ?

हालांकि ऐसे बेचारे पत्‍नी-पीडि़तों के किस्‍से तो बहुत हैं । पर मुद्दे की बात पर आते हैं। कुछ दिन पहले राजेश रोशनजी के ब्‍लॉग पर एक चित्र छपा था-


इसे पढ़कर लगा कि क्‍या वाकई दहेज संबंधी कानूनों ने कुछ पतियों का जीना मुहाल कर रखा है ?
हालां‍कि आस-पास के क्षेत्र में ऐसी एक-दो घटनाओं के बारे में सुना तो था पर नेट पर खोजा तो इस साइट पर काफी सारे मामले ऐसे देखने को मिले। भारतीय महिला से शादी करने से पहले सोचने की चेतावनी के साथ धारा 498a एवं घरेलू हिंसा अधिनियम के बारे में काफी सारी बातें कही गई हैं। और तो और कई शहरों में उपलब्‍ध टेलीफोन हेल्‍पलाइन के साथ-साथ यहां ऑनलाइन सलाह भी दी जा रही है। पर बेचारे पति करें भी तो क्‍या ?

आप सभी की प्रतिक्रियाओं के इंतजार में-

Saturday, April 05, 2008

ग से ‘गाय’ नहीं सी फॉर ‘काऊ’

मेरे चिट्ठे पर प्रकाशित डा. निरंजन कुमार का आलेख पढ़कर हमें पता चला कि कैसे इस देश का नाम इंडिया पड़ा और अपने देश के लिए आजकल भारत या हिन्‍दुस्‍तान की बजाय लोग विदेशियों की तर्ज पर इंडिया शब्‍द का प्रयोग करना अपनी शान समझते हैं।

पर ये इंडियंस वास्‍तव में चाहते क्‍या हैं ? इंडिया शब्‍द कहने से केवल इस बात का बोध नहीं होता कि फलां व्‍यक्ति अपने देश का नाम अंग्रेजी में ले रहा है बल्कि इसके बहुत गहरे निहितार्थ हैं और इसके पीछे की मंशा पर भी विचार किया जाना चाहिए।

सीधे शब्‍दों में कहा जाए तो यह तीन अक्षर का शब्‍द इंडिया हमारी हजारों वर्षों की पहचान को मिटाने की विदेशी साजिशों और हमारे देश में रहने वाले इंडियंस की नासमझी और विकृत मानसिकता का प्रतीक है।

मेरे पड़ौस में रहने वाले शर्माजी अपने दो वर्षीय नाती को घुमाने ले जाते हैं तो रास्‍ते में मिलने वाले जानवरों से उसका परिचय कराते हैं। परिचय कराते समय वे इस बात का विशेष ध्‍यान रखते हैं कि जिन भी जानवरों का नाम वे अपने नाती को बतायें वे अंग्रेजी में हों। गाय के लिए काउ, कुत्‍ते के लिए डॉग, सुअर के लिए पिग और चिडि़या के लिए बर्ड जैसे शब्‍द वे अपने छोटे से नाती को सिखाते हैं। एक दिन वे सिखा रहे थे- काउ इज अवर मदर। मुझे लगा कि अगले दिन वे यह न सिखाने लगें कि एलिजाबेथ इज अवर मदर।

खैर ये तो एक उदाहरण है। पर आप कहीं भी नजर दौड़ाईये आप ये अवश्‍य पाएंगे कि जो इंडियंस खुद अपनी पूरी उमर में अंग्रेजी नहीं सीख पाए वे बच्‍चे को अंग्रेजी में धुरंधर बनाने का अजीब सा हठ रखते हैं। हर कोई इस बात पर तुल गया है कि कैसे भी करके अपने बच्‍चे को अंग्रेजी ही सिखाई जाए और ऐसे में भले बच्‍चा अपनी भाषा हिंदी सीखने से वंचित रह जाए। हिंदी सीखने को एक गैरजरूरी और समय बर्बाद करने वाला काम समझा जाने लगा है। मेरे एक परिचित डॉक्‍टर के पास एक सज्‍जन अपने बेटे को दिखाने लाए। डॉक्‍टर ने कहा- बेटे जीभ दिखाओ। बच्‍चे ने नहीं दिखाई। फिर उसके पिता ने कहा- बेटे टंग दिखाओ और बेटे ने जीभ दिखा दी।

अपनी उमर भर गाय को गैया कहने वाले और पक्षियों को परेबा कहने वाले जब छोटे बच्‍चों के सामने बनावटी ढंग से अंग्रेजी में काउ और बर्ड हांकने लगते हैं तो दिल को बहुत कोफ्त होती है। अंग्रेजी को एक विषय के रूप में सिखाये जाने की बजाय हम बच्‍चों को पूरा ही अंग्रेज बनाने पर तुल गये हैं। इस तरह के ब्रेनवॉश से जो पीढ़ी सामने आयेगी वो बाद में अपने बुजुर्ग मां-बाप से यही पूछेगी कि- व्‍हाट इज दिस फ्रीडम फाइटर एंड व्‍हाई डिड दे फाईट फार इंडिया। तो फिर वे क्‍या जवाब देंगे ? क्‍या ऐसे लोग जो खुद अपनी पहचान मिटाने पर तुले हैं अपने बच्‍चों को समझायेंगें कि हमारे स्‍वतंत्रता-सेनानी अपनी पहचान, अपने भारत के लिए अंग्रेजों से लड़े। ये कैसे अपने बच्‍चों को ये समझा पाएंगे कि वे किस भारत देश के लिए लड़े जबकि ये लोग अब उसी भारत के खिलाफ, उसकी पहचान के खिलाफ हैं। भाषा केवल शब्‍दों के माध्‍यम से अपनी बात कहना भर नहीं है। उससे हमारी पहचान, हमारा इतिहास, हमारा सम्‍मान बहुत कुछ जुड़ा होता है।

अभिभावकों द्वारा ऐसी मानसिकता को अपना लिये जाने के भी कुछ कारण हैं। हर किसी के अंदर एक बहुत बड़ा डर बैठा हुआ है कि हमारा बच्‍चा किसी से कमतर न हो और इस कमतरी का मतलब हिंदी में बात करना, अंकल को चाचा कहना और टेंपल को मंदिर कहना समझ लिया गया है। लोगों को लगता है यदि बच्‍चे को जिंदगी की रेस में दौड़ाना है तो उन्‍हें घोड़े को घोड़े की बजाय हॉर्स कहना सिखाना होगा। हर कोई अपनी पहचान को मिटाने और अंग्रेज बन जाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। भारतीयता को मूर्खता, पिछड़ेपन और गँवारपन का पर्याय मान लिया गया है। लोग खुद के भारतीय होने पर शर्म महसूस करते हैं। हम खुद के भारतीय होने के खिलाफ लड़ रहे हैं। अपनी पहचान के खिलाफ लड़ रहे हैं। हम उस पहचान के‍ खिलाफ लड़ रहे हैं जिससे हमारा अस्तित्‍व है और अपने ही अस्तित्‍व के खिलाफ इस लड़ाई में हम खुद को ही हार जाने वाले हैं।

एक देश दो नाम

अमेरिका में प्रोफेसर डा. निरंजन कुमार का यह लेख 3 अप्रैल के दैनिक जागरण में छपा था। इस लेख में उन्‍होंने भारत के विविध नामों और उनकी उत्‍पत्ति पर प्रकाश डाला है। बेहद जानकारीपूर्ण यह लेख मैं दैनिक जागरण और डा. निरंजन कुमार के आभार सहित यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं-


एक देश दो नाम

-डॉ. निरंजन कुमार

विदेश में रहते हुए अपने देश को नए तरीके से देखने-समझने की दृष्टि मिलती है। इनमें से एक है कि अपने देश का नाम क्या हो? वैसे अपने देश के कई नाम रहे हैं-जंबूद्वीप आर्यावर्त, आर्यदेश या आर्यनाडु, भारत, हिंद, हिंदुस्तान, इंडिया आदि। जंबूद्वीप नाम धार्मिक होने की वजह से एवं आर्यावर्त और आर्यदेश या आर्यनाडु जाति बोधक होने से खुद ही अप्रचलित हो गए। आज प्रमुख रूप से तीन नाम मिलते हैं- इंडिया, हिंदुस्तान, और भारत। सबसे पहले इंडिया को देखें। इंडिया काफी पुराना शब्द है और ग्रीक भाषा से आया है। ईसा पूर्व चौथी-पांचवीं सदी में ग्रीक लोगों ने सिंधु नदी के लिए इंडस शब्द का प्रयोग किया और इससे आगे की भूमि को इंडिया कहा, जो बाद में चलकर इंडिया बन गया। ग्रीक से यह दूसरी सदी में लैटिन में आया और फिर 9वीं सदी में अंग्रेजी में, लेकिन अंग्रेजी में इसका बहुलता से प्रयोग 16वीं- 17वीं सदी में हुआ। इंडिया शब्द पर विचार करें तो एक ओर तो यह पश्चिम/अंग्रेजी औपनिवेशिक-साम्राज्यवादी शासन की देन है और दूसरी तरफ यह शब्द उन देशवासियों को अपने में समाहित करता नहीं दिखाई पड़ता है, जो देश की मेहनतकश आम जनता है, जो गांवों और छोटे शहरों में रहती है या बड़े शहरों में हाशिए पर है। इंडिया और इंडियन से हमें ऐसे लोगों या वर्ग का बोध होता है जो शक्ल और सूरत में भले ही देश के अन्य लोगों की तरह हों, पर अपने व्यवहार, वेशभूषा, बोली और संस्कृति में मानो पश्चिम की फोटोकापी हों। इस तरह इंडिया शब्द में एक तरफ जहां साम्राज्यवादी गंध है तो दूसरी ओर यह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता दिखाई नहीं पड़ता। दूसरा शब्द है हिंदुस्तान। यह शब्द भी काफी पुराना है। इसका उद्गम भी उसी सिंधु नदी से हुआ है। ईरानी लोग स का उच्चारण नहीं कर पाते थे, इसे वे ह कहते थे। इसलिए प्राचीन ईरानी और अवेस्ता भाषाओं (ईपू10वीं सदी) में सिंधु के लिए हिंदू मिलता है। ईपू 486 की पुस्तक नक्श-ई-रुस्तम में उल्लेख मिलता है कि ईरान के एक शासक डारीयस ने इस प्रदेश को हिंदुश कहा। अवेस्ता भाषा में स्थान के लिए स्तान शब्द मिलता है। इस प्रकार यह प्रदेश हिंदुस्तान कहा जाने लगा और यहां के निवासी हिंदू। उस समय हिंदू शब्द धर्म का पर्याय नहीं था। अरबी में इसे अलहिंद कहा जाता था। 11वीं सदी की इतिहास की पुस्तक है तारीख अल-हिंद। इसी से हिंद शब्द आया। इस प्रकार हिंदुस्तान शब्द शुद्ध रूप से एक सेकुलर शब्द था, लेकिन मुख्य रूप से यह उत्तर भारत के लिए इस्तेमाल होता था। अंग्रेजी शासन काल में फूट डालो और राज करो कि नीति के तहत हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक खाई पैदा होनी शुरू हुई। इसी समय दुर्भाग्यवश नारा आया हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान का, जो कि धार्मिक- राजनीतिक भावना से प्रेरित था। इस बढ़ती हुई दूरी का दुष्परिणाम सामने आया जिन्ना की टू नेशन थ्योरी के रूप में। इस द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत के अनुसार, हिंदू और मुस्लिम, दो अलग-अलग राष्ट्र या राष्ट्रीयता हैं। हिंदुस्तान हिंदुओं के लिए है, इसलिए मुसलमानों के लिए एक अलग देश होना चाहिए। इसी से पाकिस्तान की मांग आई। इस तरह हिंदुस्तान शब्द, जो पूरी तरह से पंथनिरपेक्ष शब्द था, एक तरह से सेकुलर नही रह गया। अधिकांश बड़े नेता-गांधीजी, नेहरू, मौलाना आजाद आदि जिन्ना से सहमत नहीं थे, लेकिन विशिष्ट ऐतिहासिक, राजनीतिक परिस्थितियों में पाकिस्तान बन गया। हमारे नेताओं ने यह कभी नहीं माना की हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं का देश है। यह अनायास नहीं था कि जब देश का संविधान बना तो इसके पहले ही अनुच्छेद में कहा गया है कि इंडिया अर्थात भारत राज्यों का एक संघ होगा। इस मिले-जुले धर्म, समाज और संस्कृति वाले देश को पूरी दुनिया आश्चर्य और सम्मान से देखती है। इंडिया शब्द को अपनाना दुर्भाग्यपूर्ण था, शायद इसके पीछे औपनिवेशिक शासन का मनोवैज्ञानिक दबाव रहा होगा। औपनिवेशिक-मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण ही अनुच्छेद 343 के तहत दुर्भाग्यवश हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी राजभाषा बना दिया गया। इसी मानसिकता के तहत कालिदास को भारत का मिल्टन, समुद्र गुप्त को नेपोलियन बोनापार्ट और कह दिया जाता है, जो कि बिल्कुल औपनिवेशिक व्याख्या है, लेकिन आज वह दबाव खत्म हो चुका है। भारत नाम सबसे सार्थक है। यह शब्द संस्कृत के भ्र धातु से आया है, जिसका अर्थ है उत्पन्न करना, वहन करना निर्वाह करना। इस तरह भारत का शाब्दिक अर्थ है-जो निर्वाह करता है या जो उत्पन्न करता है। भारत का एक अन्य अर्थ है ज्ञान की खोज में संलग्न। अपने अर्थ और मूल्य में यह शब्द सेकुलर भी है। यह नाम प्राचीन राजा भरत से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसका कोई धार्मिक मतलब नहीं। संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित 23 भाषाओं में से लगभग सभी में इसे भारत, भारोत, भारता या भारतम कहा जाता है। क्या अच्छा हो कि हम इसे इंडिया की जगह भारत पुकारें।

साभार: दैनिक जागरण

Friday, April 04, 2008

चीन के आगे गिड़गिड़ाने के मायने

अब तो रोजमर्रा की बात हो चली है कि हमारे माननीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी चीन को आश्‍वासन देते रहते हैं कि हमारी धरती से आपके खिलाफ हम कोई गतिविधि नहीं होने देंगे। उधर चीन कभी आंखें दिखाता है तो कभी पीठ थपथपाता है।

फिर से प्रणब मुखर्जी ने चीन के आगे घुटने टेकने वाले रुख के साथ वही बात दोहराई कि भारत तिब्‍बत को चीन का हिस्‍सा मानता है और भारत में ओलंपिक मशाल को पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी। साथ ही दलाईलामा को फिर से समझाया गया है कि वे भारत में बस मेहमान बनकर रहें और चीन के खिलाफ कोई हरकत न करें। हालांकि वैसे भी वे कुछ करने के मूड में नहीं लगते।

विदेश नीति के हिसाब से देखा जाए तो भारत और चीन के रिश्‍तों में लंबे समय की कटुता के बाद अब संबंध सामान्‍य हो चले हैं। हालांकि जानकारों का कहना है कि द्विपक्षीय संबंधों के इस मधुर दौर में भारत को चीन के खिलाफ कुछ भी कहने से बचना चाहिए। पर मेरा मानना है कि भारत भले ऐसा सोचता हो चीन कभी भारत के साथ संबंध मधुर रखने का पक्षधर नहीं रहा है। वह केवल दबाव की विदेश नीति भारत जैसे देशों पर लागू करता रहा है और संभवत: आगे भी करता रहेगा। दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध भी इस कारण सामान्‍य हैं कि भारत के साथ उसका कारोबार 60 अरब डॉलर के आंकड़े पर दस्‍तक दे रहा है और आर्थिक संबंधों को बनाये रखने तथा भारत में अपना माल खपाने के लिए वह अच्‍छे संबंधों की बात कर रहा है। यदि भारत-चीन कारोबार ऐसी ऊंचाईयां नहीं छू रहा होता तब भी क्‍या वह भारत के साथ ऐसे ही संबंधों का पक्षधर होता इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है। संबंधों की इस कथित मधुरता के दौर में भी वह भारत के प्रधानमंत्री के अपने ही एक सीमांत प्रदेश में दौरे पर आ‍पत्ति उठाता है और प्रणब मुखर्जी जैसे लोगों को उसका बचाव करना पड़ता है।

कूटनीतिक नजरिए से देखा जाए तो भारत ने तिब्‍बत मसले पर प्रारंभ में समझदारी का परिचय दिया और तिब्‍बत को चीन का घरेलू मामला मानकर उससे दूरी बनाये रखी। यहां तक कि पूरा विश्‍व समुदाय इस बात पर चीन को गरियाता रहा पर भारत यही दोहराता रहा कि तिब्‍बत चीन का अभिन्‍न अंग है और वह अपनी जमीन से चीन विरोधी कोई गतिविधि नहीं होने देगा। वैसे भी भारत को चीन से सुधरते संबंधों की कीमत पर तिब्‍बत मसले में कोई टांग नहीं अड़ानी चाहिए। खासकर तब जब तिब्‍बती धर्मगुरू और उनकी निर्वासित सरकार भारतीय क्षेत्र में रहती है। क्‍योंकि इससे सीधा-सीधा संदेश जाता कि भारत अपनी जमीन से चीन विरोधी त्‍त्‍वों को समर्थन दे रहा है।

पर शुरू से ही चीन को भारत के द्वारा अपना रुख स्‍पष्‍ट कर दिये जाने के बावजूद वह भारत पर दबाव बना रहा है या कहें कि भारत की कमजोर विदेश नीति का वह पूरा फायदा उठाना चाहता है। जब भारत की धरती पर आकर अमेरिका की नेता नैंसी पेलोसी चीन को खरी-खोटी सुनाती हैं तब भी भारत खुद को इससे दूर रखता है। फिर भी हमारे नेताओं को बार-बार सफाई देने की जरूरत क्‍यों पड़ती है। उल्‍टा भारत कम से कम इस मामले में चीन को यह तो कह ही स‍कता था कि उसे अंतर्राष्‍ट़ीय समुदाय की भावनाओं का ख्‍याल रखना चाहिए था या तिब्‍बत मसले का वह शांतिपूर्वक समाधान खोजे। पर हमारे नेताओं को चीन से अपनी पीठ थपथपाये जाने का चस्‍का लग गया है और शुरू से ही स्‍पष्‍ट रुख रखने के बावजूद चीन की मनमर्जी के हिसाब से बयान दे रहे हैं। इससे अप्रत्‍यक्ष रूप से अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के चीन पर पड़ने वाले दबाव को कम करने की साजिश की बू आती है और संदेश जाता है कि भारत इस मामले में चीन के साथ है। कहने की जरूरत नहीं कि इसमें बहुत बड़ा हाथ भारत के देशद्रोही वामदलों का है जो हमेशा फिलिस्‍तीन, कश्‍मीर या ईरान मसले पर चिल्‍ला-चिल्‍लाकर आसमान एक कर देते हैं। पर तिब्‍बत मसले पर मुंह पर पट्टी बांध लेते हैं क्‍योंकि इससे उनका चहेते चीन के हित जुड़े हैं जिसे वो अपना माई-बाप मानते हैं। पर भारत सरकार को यह तो सोचना चाहिए कि वह गद्दारों के दबाव में अपनी विदेश नीति चलाए या भारतीय हितों के मद्देनजर।

कुल मिलाकर शुरूआत में सही नीति अपनाने के बावजूद हमारे नेता अब पूरी तरह से चीन के दबाव मे दिख रहे हैं और बेवजह भारत की छवि को खराब करने के लिए चीन की जी-हुजूरी करने में जुट गये हैं।